शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

तैलंगकुलम् का प्रतिभा सम्‍मान समारोह 6 नवम्‍बर, 2016 को जयपुर में

तैलंगकुलम् का अक्‍टूबर 16 अंक 
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प्रतिभा-सम्मान:
1- राजस्थान एवं अन्य राज्यों के बोर्डों की दसवीं एवं बारहवीं परीक्षाओं वर्ष 2016 में 75 प्रतिशत या अधिक अंक लाने वाले मेधावी छात्र-छात्राएं मार्क्स-शीट की प्रमाणित प्रति एवं पासपोर्ट साइज की दो नवीनतम फोटो (एक समाचार-पत्र के लिए और दूसरी प्रमाणपत्र पर चिपकाने के लिए) भिजवाएं।
2-सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेन्डरी एजुकेशन(सी०बी०एस०इ०) की परीक्षाओं वर्ष 2016 में ए-प्लस या इससे ऊँची रैंक लाने वाले मेधावी छात्र-छात्राएं मार्क्स-शीट की प्रमाणित प्रति एवं पासपोर्ट साइज की दो नवीनतम फोटो (एक समाचार-पत्र के लिए और दूसरी प्रमाणपत्र पर चिपकाने के लिए) भिजवाएं। कृपया अपना मोबाइल/टेलीफोन नम्बर सूचित करें।
विशेष:
समाज के वरिष्ठ सदस्य श्री गणेश बल्लभ गोस्वामी ने 2015 से अत्यन्त मेधावी छात्र-छात्रा को अपने माता-पिता की स्मृति में भगवती देवी-श्री ऋषिकेश गोस्वामी शिक्षा पुरस्कार देने की घोषणा की है जिसके अन्तर्गत उनके द्वारा प्रति वर्ष 10000 रू. की राषि बतौर नकद पारितोषिक प्रदान की जाती है। इस बार क्षेत्रीय बोडर््स एवं केन्द्रीय बोर्ड की दसवीं व बारहवीं की परीक्षा में तीनों फेकल्टियों (आर्ट्स, कॉमर्स एवं विज्ञान) में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्षन करने वाले (कुल 6) तथा इन जनरल ओवरआल सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्रा को (कुल 2) को 1100 रू. प्रति छात्र नकद प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी।
प्रविष्टि की अन्तिम तिथि तथा पता
प्रविष्टि 10 अक्टूबर, 2016 को सायं 5 बजे तक ‘अनुष्टुप, 13, गायत्री नगर, सोडाला, जयपुर-302006 अथवा 54/151, देवर्षि सदन, पंचवटी मार्ग, मान सरोवर, जयपुर-302020 के पते पर भिजवाएं। विलम्बित प्रविष्टियां अस्वीकार्य होंगी। कृपया अपना मोबाइल/टेलीफोन नम्बर सूचित करें।
विद्वज्जन सम्मान :
समाज द्वारा इस वर्ष साहित्य, संगीत और दृष्यकला (चित्रकला, रंगमंच, सिनेमा आदि) के क्षेत्र में विशिष्ठ अवदान करने वाले व्यक्तियों का सम्मान किया जाएगा। यह सम्मान विषय विषेषज्ञों की अध्यक्षता में गठित समिति के चयन के आधार पर किया जाएगा। पुरस्कार की निम्न केटेगरीज होंगी: -
लाइफ टाइम एचीवमेन्ट अवार्ड, 2016:
साहित्य, संगीत और दृष्यकला (चित्रकला, रंगमंच, सिनेमा आदि) के क्षेत्र में कार्य करते हुए न्यूनतम 30 वर्ष पूरे कर लिए हों तथा उनकी आयु 65 वर्ष या उससे अधिक हो।
साहित्य-निधि सम्मान:
साहित्य के क्षेत्र में कार्य करते हुए न्यूनतम 25 वर्ष पूरे कर लिए हों तथा उनकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक हो।
विशिष्ठ कला-साधना सम्मान:
संगीत और दृष्यकला (चित्रकला, कार्टून, आदि विधाओं) के क्षेत्र में कार्य करते हुए न्यूनतम 25 वर्ष पूरे कर लिए हों उनकी आयु 45 वर्ष या उससे अधिक हो।
रंग-पथिक सम्मान:
रंगमंच, सिनेमा (अभिनय, लेखन, निर्देशन) आदि के क्षेत्र में कार्य करते हुए न्यूनतम 20 वर्ष पूरे कर लिए हों तथा उनकी आयु 40 वर्ष या उससे अधिक हो।
उपर्युक्त पुरस्कारों के लिए समाज के गणमान्य साहित्यकारों, संगीतज्ञों एवं कलाकारों से निवेदन है कि अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित परिचय (बायोडेटा/प्रोफाइल) 10 अक्टूबर, 2016 को सायं 5 बजे तक ‘अनुष्टुप, 13, गायत्री नगर, सोडाला, जयपुर-302006 अथवा 54/151, देवर्षि सदन, पंचवटी मार्ग, मान सरोवर, जयपुर-302020 के पते पर बंद लिफाफे में भिजवाने का श्रम करें। कृपया अपना मोबाइल/टेलीफोन नम्बर सूचित करें।
शोध-शास्त्री सम्मान:
शैक्षणिक वर्ष 2015-16 के दौरान पी.एच.डी./डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले शोध-शास्त्री डिग्री/प्रमाणपत्र की प्रमाणित प्रति एवं पासपोर्ट साइज की दो नवीनतम फोटो (एक समाचार-पत्र के लिए और दूसरी प्रमाणपत्र पर चिपकाने के लिए) के साथ निम्न निर्धारित प्रपत्र में भिजवाएं।
शोधशास्त्री सम्मान हेतु प्रपत्र


शोधशास्त्री का नाम-----------------------पिता/पति का नाम------------------------
स्नातकोत्तर उपाधि किस विश्वविद्यालय से ग्रहण की, श्रेणी, विषय व वर्ष ------------------------------
पी.एच.डी./डॉक्टरेट में शोध का विषय---------------------------------------------विश्वविद्यालय का नाम----------------------------------------------------------
पी.एच.डी.की डिग्री अवार्ड होने का वर्ष-------------------------------------------
किसके निर्देशन में शोध किया-----------------------------------------------------
क्या शोध प्रकाशित भी हुआ है ,यदि हां तो प्रकाशक का नाम---------------------
क्या आप जोब में हैं, यदि हां, तो प्रतिष्ठान का नाम--------------------------------
आप वहां किस पद पर पदस्थापित हैं ---------------------------------------------
हस्ताक्षर-------------------------------
पूरा नाम-------------------------------
मोबाइल/टेलीफोन नम्बर----------------------
प्रविष्टि की अन्तिम तिथि तथा पता
प्रविष्टि 10 अक्टूबर, 2016 को सायं 5 बजे तक अनुष्टुप, 13, गायत्री नगर, सोडाला, जयपुर-302006 अथवा 54/151, देवर्षि सदन, पंचवटी मार्ग, मान सरोवर, जयपुर-302020 के पते पर भिजवाएं। विलम्बित प्रविष्टियां अस्वीकार्य होंगी।
डा. प्रेमचन्द गोस्वामी-स्मृति पुरस्कार:
समाज के ख्यातनाम चित्रकार, साहित्यकार एवं पत्रकार रहे डा. प्रेमचन्द्र गोस्वामी की स्मृति में लेखन, चित्रकला एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सजातीय पुरूष/महिलाओं से “डॉ० प्रेमचन्द्र गोस्वामी स्मृति-पुरस्कार” के लिए निर्धारित प्रपत्र में प्रस्ताव आमंत्रित किए जाते हैं। इस वर्ष यह पुरस्कार चित्रकला के लिए प्रदान किया जाएगा। प्रस्ताव स्वयं के द्वारा अथवा अनुशंशक द्वारा भिजवाए जा सकते हैं। इस पुरस्कार के अन्तर्गत चयनित व्यक्ति (पुरूष/महिला) को रू0 5100, -की नकद राशि एवं प्रशस्ति पत्र दिया जाएगा। यह पुरस्कार डा. प्रेमचन्द्र गोस्वामी के सुपुत्र श्री तटस्थ गोस्वामी द्वारा प्रायोजित किया गया है।
पुरस्कार हेतु चयन करते समय पिछले तीन वर्षों की उपलब्धियों एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन को योग्यता का आधार बनाया जाएगा। अतः पुरस्कार हेतु घोषित विधा में आवेदन करते समय आवेदक अपने तीन वर्षों की उपलब्धियों का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करेंगे।
इस वर्ष चित्रकला के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सजातीय महिला/पुरुष निर्धारित प्रारूप में स्वयं अथवा अन्य व्यक्ति की अनुशंशाएं (जिस पर मूल रचनाकार की सहमति आवश्यक है), आमन्त्रित हैं।
प्रविष्टि की अन्तिम तिथि:
आवेदन एवं अनुशंशाएं दिनांक 10 अक्टूबर, 2016 तक तैलंग कुलम समाज के कार्यालय के पते सचिव, तैलंग-कुलम समाज 13, गायत्री नगर, सोडाला-302006 अथवा 54/151, देवर्षि सदन, पंचवटी मार्ग, मान सरोवर, जयपुर-302020 में पहुंचाना सुनिश्चित करावें ताकि पुरस्कार के लिए प्राप्त आवेदन एवं अनुशंशाओं पर निर्णायक समिति द्वारा निर्णय लिया जाकर पुरस्कार की घोषणा की जा सके। “डा0 प्रेमचन्द्र गोस्वामी स्मृति-पुरस्कार: 2016” के लिए पुरस्कार के दावे के लिए किसी अन्य संस्था द्वारा प्रदत्त पुरस्कारों को विषिष्टता/प्राथमिकता प्रदान नहीं की जाएगी। 
निर्णायक समिति का निर्णय अन्तिम और मान्य होगा जिसके विरूद्ध कोई आपत्तियां स्वीकार्य नहीं होगी।
“डा0 प्रेमचन्द्र गोस्वामी स्मृति-पुरस्कार: 2016” के लिए(चित्रकला के क्षेत्र में)
आवेदन प्रारूप
(स्वयं के स्तर पर सादे कागज पर (ए-4 साइज) में आवेदन पत्र हस्तलिखित एवं प्रिन्टेड प्रस्तुत करें )
आवेदन/अनुशंशा करने वाले का नाम एवं पता:-----------------------------------
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जन्म तिथि एवं आयु:----------------- शिक्षाः--------------------------------
01 अप्रेल 2014 से 31 मार्च, 2016 की अवधि में आवेदक द्वारा प्रदर्शित एकल एवं सामूहिक प्रदर्शनी का विवरण--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
उक्त अवधि में चित्रकला के क्षेत्र में आवेदक द्वारा प्राप्त अन्य उपलब्धियों का विवरण: ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
उक्त अवधि में आवेदक की कोई बहुवर्वित कृति जिसका वह उल्लेख करना चाहे:-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
उक्त अवधि में आवेदक चित्रकार को प्राप्त पुरस्कार/सम्मान/उपाधि आदि का विवरण:(प्रमाण संलग्न कराए जा सकते हैं।)
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आवेदन/अनुशंशा करने वाले का 
नाम एवं हस्ताक्षर
पता एवं मोबाइल/टेलीफोन नं.
नोट: उयर्युक्त समस्त केटेगरीज के आवेदकों से निवेदन है कि वे अपने प्रस्ताव स्पीड पोस्ट सेवा के जरिए भिजवाएं ताकि प्रस्तावों की नियत अवधि तक प्राप्ति होना सुनिश्चित हो सके। -आयोजन समिति)
रामादेवी भट्ट संस्कृति संवर्धन सम्मान:
श्रीमती रामादेवी भट्ट (1912-2002) एक विलक्षण महिला थीं जिन्होंने अपने स्नेहमय व्यक्तित्व से बृहत् तैलंग-कुलम् की विशिष्टता, मर्यादा, अस्मिता, परम्परा, शिष्टाचार, खान-पान, वेश-भूषा, संस्कृति, संगीत, आदि के संयोजन, संरक्षण, और संवर्धन में आजीवन अमूल्य व अविस्मरणीय योगदान दिया। एक ममतामयी लोकोपकारक महिला के रूप में श्रीमती रामादेवी का जीवन-दर्शन अनुकरणीय रहा है। उन्होंने कोई औपचारिक उपाधियाँ नहीं लीं, किन्तु उनका ज्ञान व विवेक अत्यंत प्रभावशाली था। 
उन्होंने बाल्यावस्था में ही अपने एक नेत्र की ज्योति खो दी थी, किन्तु वे सूक्ष्म से सूक्ष्म स्वरूप का कार्य कर सकती थीं और उत्कृष्ट पाकशास्त्री थीं। वे भट्ट-तैलंग-गोस्वामी समुदाय के हित में प्रत्येक परिवार के सार्वजनिक और सामुदायिक कार्य के लिए आवश्यकतानुसार सलाह, संरक्षण, सुझाव, निर्देश, सहायता, सम्मति, या समर्थन से आजीवन अपनी गरिमामय उपस्थिति के साथ उपलब्ध रहती थीं। उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि वे सभी व्यक्तियों पर बिना किसी भेदभाव के अपना अपार स्नेह समान रूप से बरसाती थीं। चूंकि वे जीवनपर्यंत प्रत्येक व्यक्ति की यथासम्भव सहायता और सहयोग के लिए हमेशा सुलभ रहीं, हमने उनका महत्त्व उस समय तो जाना ही, वस्तुतः आज भी उनकी पावन-स्मृति और उनके कार्यकलाप हमारे प्रेरणा-स्रोत बने हुए हैं। 
‘भट्ट-तैलंग-गोस्वामी समुदाय की महिलाओं के प्रति उनका स्नेह, विश्वास व सद्भावना एक अन्य ऐसा पक्ष है जिसका अनुरक्षण व पोषण वे निरंतर करती रहीं। समुदाय के परिवारों के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यों में महिलाओं की महती भूमिका को वे सदा महत्त्व देती थीं और उसका समुचित आदर करती थीं। उनका यही सोच इस सम्मान के प्रायोजकों के मानस पर अंकित रहा है और उसी अनुराग के प्रति अपना आदर व्यक्त करने के लिए उन्होंने एक पुरस्कार “रामादेवी भट्ट संस्कृति संवर्धन सम्मान”” - की स्थापना की है। 
सन् 2015 से (रु. 5001,पांच हज़ार एक रुपये) के उक्त पुरस्कार, शाल व श्रीफल द्वारा प्रतिवर्ष एक ऐसी विशिष्ट महिला का सम्मान करने की योजना है जिसका भट्ट-तैलंग-गोस्वामी समुदाय की परम्पराओं, रीति-रिवाज़ों, संस्कारों, सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक आयोजनों, शिष्टाचार, संगीत, आदि के संयोजन और संरक्षण में प्रशंसनीय भूमिका रही है। ‘तैलंग-कुलम् समाज ऐसी आदरणीय महिलाओं के विषय में स्वयं उन्हीं के द्वारा या अन्य आधिकारिक स्रोतों से जानकारी प्राप्त कर समिति को उपलब्ध कराएगी, जिसकी अनुशंसा से यह सम्मान प्रतिवर्ष समाज की वयोवृद्ध महिला को जिसका सामुदायिक संस्कृति के संवर्द्धन में विषिष्ट योगदान रहा हो, को इस सम्मान के प्रायोजकों द्वारा समाज के माध्यम से प्रदान किया जाएगा।
मातृ-स्मृति कोष:
इस कोष का गठन 2013 में किया गया था। जो पुत्र/पुत्रियां मातृ वियोग की पीड़ा सहन कर रहे हैं तथा अपनी जन्मदात्री मां की स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहते हैं, वे इस कोष में 1100 रू. वार्षिक का आर्थिक सहयोग प्रदान कर सकते हैं। इस राशि का उपयोग प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहन राशि प्रदान कर किया जाता है। इस लिहाज से शैक्षणिक विकास में इस कोष की महती भूमिका रहेगी।
सदस्यता अभियान:
इस वर्ष समारोह में भाग लेने वाले सभी महानुभावों का समाज का प्राथमिक सदस्य बनना अनिवार्य किया गया है। सदस्यता शुल्क प्रति परिवार 200 रू. निर्धारित किया गया है। विवाहित पुत्र/पुत्री को परिवार की इकाई माना गया है। माता-पिता की सदस्यता के लिए या तो वे स्वयं अथवा जिस पुत्र/पुत्री के पास वे निवास की रहे हैं, वह उत्तरदायी होगा। इस उद्देश्य से माता-पिता स्वतंत्र इकाई माने जाएंगे।
सामूहिक-भोज:
इस वर्ष 6 नवम्बर, 2016 को सामूहिक भोज का भी आयोजन किया गया है जिसके लिए प्रति व्यक्ति 150 रू. का कूपन जारी किया जाएगा। 10 वर्ष तक के बच्चो को कूपन से मुक्त रखा गया है। समारोह एवं सामूहिक भोज के लिए स्थान का चयन किया जा रहा है। फाइनल होते ही इसी माध्यम से सूचित किया जाएगा। सभी से निवेदन है कि अधिक से अधिक संख्या में कूपन ले कर समारोह के सह भागी बनें। 
कूपन एवं सदस्यता की संकलित करने के लिए जयपुर को जोनवार विभक्त कर जोनवार दल बनाए गए हैं। तदनुसार समाज का प्रतिनिधि आपसे यथासमय सम्पर्क करेगा। कृपया उन्हें अपना अपूर्व सहयोग प्रदान करें तथा कूपन व सदस्यता ग्रहण कर नियत शुल्क प्रदान करने का श्रम करें।
समस्त पदाधिकारी एवं सदस्य व आयोजन समिति

दिनांक 21 सितम्बर, 2016 तैलंग-कुलम् समाज

सोमवार, 27 जुलाई 2015

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

‘इतर समाज’ को भी विचार करना होगा अपने भविष्य के बारे में



एक गम्‍भीर और विचारणीय विषय को आपके समक्ष रख रहा हूँ- ‘इतर समाज’।
      आज तक समाज के गम्‍भीर विचारकों द्वारा इस पर चिन्‍तन, मनन और मन्‍थन किया जाता रहा है। लिखने की हिम्‍मत विरलों ने ही की होगी या लिखते-लिखते लेखनी रुक‍ गई होगी। टूटने के कगार पर पहुँच चुके ‘दाक्षिणात्‍य वैल्‍लनाडु ब्राह्मण समाज’ के लिए उन्‍हें ‘स्‍वांत: सुखाय’ की नीति पर चल कर अपने उत्‍तरदायित्‍व के प्रति चैतन्‍य होने की आवश्‍यकता ही अनुभव नहीं हो रही होगी। परिणामस्‍वरूप उनके मौन ने समाज को विघटन के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया है। परिणाम आपके सामने हैं। एक ‘इतर समाज’ खड़ा हो कर उनके मौन पर हँस रहा है औऱ वे गम्‍भीर विचारक, मूक अपने उत्‍तरदायित्‍व से विमुख हो रहे हैं।
      विगत के उत्‍कर्ष को देख कर जीना भयावह हो सकता है। काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन अवश्‍य होने चाहिए, किन्‍तु ‘इतर समाज’ के वर्तमान स्‍वरूप का तेजी से होता फैलाव समझ से परे है। यह कैंसर की तरह पुरातन समाज को जकड़ता जा रहा है। सामाजिक परिवर्तन समाज से इतर, उच्‍चता की अभिलाषा को परिपोषित करते हुए और समाज के समक्ष एकाता बनाये रखते हुए, उन्‍हीं प्रतिमानों को सहेजने में यदि सक्षम होते हैं, तो समाज उन्‍हें अवश्‍य स्‍वीकार करता है, अन्‍यथा वह उनका पराभव है, विजय नहीं, श्रेष्‍ठता नहीं। मुंबई का फि‍ल्‍म जगत् और संगीत का अपरिमित क्षेत्र, ऐसे उदाहरण हैं (हमारे समाज के कतिपय लोग भी इससे जुड़े हुए हैं, इसलिए केवल इन्‍हीं दो क्षेत्रों का उल्‍लेख कर रहा हूँ) जहाँ ऐसे प्रतिमान स्‍थापित हैं, जो इतर समाज के रूप में सक्षम है। यह उनके अपने विलक्षण प्रतिभा के दोहन के लिए अवसर जुटाने के लिए किये गये प्रयास हैं, जिसमें, जात-पाँत का कोई भेदभाव या प्रभाव नहीं है, फि‍र भी वे अपने समाज के परिपोषक हैं। समाज ने इन्‍हें स्‍वीकार कर लिया है, किन्‍तु हमारा समाज अभी इसके लिए तत्‍पर नहीं और योग्‍य भी नहीं। कतिपय हमारे ‘इतर समाज’ के उदाहरणों को भी धरातल से सोचें, तो वह समाज से कटे हुए हैं, न वे ‘इतर समाज’ के संवाहक है और न ही परिपोषक, वे अपने परिवार तक ही सीमित हैं।
      जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ, हमारे ‘इतर समाज’ की, जो पुरातन समाज में से एक नई शाखा को विकसित कर चुकी है, परिपोषित होती हुई शीघ्र ही एक वंशवृक्ष का रूप धारण कर रही है। हमारे समाज के मूल वंशवृक्ष की जड़ें इससे कमजोर हुई हैं। सामाजिक प्रदूषण से वह अभी तो सम्‍हली हुई है, क्‍योंकि दशकुलवृक्ष की भाँति वह दृढ़ सांस्‍कृतिक मूल्‍यों से पोषित है और एक समृद्ध समाज उसका पोषण कर रहा है। यह प्रकृति का नियम है। अगर इस सत्‍य पर विचारकों को व्‍यंग्‍य करने का अवसर मिल रहा है, तो वह अवश्‍य करें, किन्‍तु किसी कोने में टीस तो उठ ही रही होगी, चाहे वे इस परिणाम को सुखद मान लें या दुखद, पर इतना तो वे भी मानते होंगे कि अन्‍य समाजों की तुलना में हम कहीं भी नहीं ठहरते, य‍हाँ तक कि धर्म, साहित्‍य व प्रशासन के क्षेत्र में भी बहुत अधिक सफल नहीं माना जा सकता।
      मेरा आग्रह है, ‘इतर समाज’ को अपने नीति, नियम, परिपाटी बनानी होंगी। यदि वे अपने समाज को पुराने सड़े गले समाज (उनकी दृष्टि में) से जुड़ा हुआ मानते हैं, तो वे यह दुस्‍साहस कर रहे हैं। वे पुराने समाज (अपने पैतृक कुटुम्‍ब) में तो घुन लगा ही रहे हैं, अपनी पीढ़ी को भी सही दिशा नहीं दे रहे हैं, जिनके परिणाम सुखद नहीं होंगे। यही उन्‍हें समझना होगा। साहस है, तो नई दुनिया बनायें!!!! उन्‍हें ढूँढ़ना होगा वह पूर्व पुरुष, पह प्रथम परिवार जिसने इस इतर समाज की नींव डाली, उसको जन्‍म दिया, तभी उनका वंशवृक्ष सही मायनों में फलेगा फूलेगा। इस कार्य में यदि विलम्‍ब हुआ तो प्रकृति तो अपना संतुलन बनायेगी है, वे समाज से कहीं अलग-थलग नहीं कर दिये जायें, मुझे डर है, तब वे अपनी भावी पीढ़ी को उनके यक्ष प्रश्‍नों का जवाब नहीं दे पायेंगे। आज और अभी तो वे सक्षम हैं, किन्‍तु कल वे पथभ्रष्‍ट कहलायेंगे।
एक कहानी है- 'एक गाँव के रेल्‍वे स्‍टेशन पर एक रेल आकर रुकी। उसमें से एक मुसाफि‍र उतरा। प्‍लेटफार्म खाली था। एक भी व्‍यक्त्‍िा उसमें नहीं चढ़ा। रेल चली गई। स्‍टेशन से बाहर आते ही मुसाफि‍र को एक व्‍यक्ति दिखाई दिया। साधारण कद काठी का, किन्‍तु बदसूरत। उसके चेहरे को देख कर मुसाफि‍र के चेहरे के भाव बदले। वह उसके पास आकर बोला- ‘यहाँ सभी मेरे जैसे बदसूरत लोग रहते हैं, इसलिए कोई तुम्‍हें पसन्‍द करे या तुम उसे पसंद करो यह जरूरी नहीं। इसलिए यहाँ सबके पास पिस्‍तौल हैं। यहाँ न कोई पुलिस व्‍यवस्‍था है और न ही न्‍यायालय। इसलिए कोई कभी भी तुम्‍हें मार सकता है और तुम किसी को कभी भी मार सकते हो। यहाँ अभी तक अपराध नहीं हुए है। ध्‍यान रखना, हर आँख एक दूसरे को देखती रहती हैं, इसलिए यहाँ जब तक रहना है, तो यह बात ध्‍यान में रखनी होगी। तुम पहली बार आए हो। मुझे देख कर जो तुम्‍हारे चेहरे की प्रतिक्रिया थी, मैं तुम्‍हें मार सकता था, पर तुम्‍हें नहीं मार रहा हूँ, क्‍योंकि तुम निहत्‍थे हो। लो, तुम्‍हें यह पिस्‍तौल दे रहा हूँ। तुम आ गये हो, पर जा नहीं पाओगे। तुम कितने दिन जी पाओगे, यह निर्णय तुम्‍हें करना है।'
      इस कहानी का वर्णन करने का उद्देश्‍य यही था, कि ‘इतर समाज’ को अपने ध्‍येय निश्चित करने होंगे। बैसाखी पर चलने से उनके विकास की गति में हमेशा रोड़े आएँगे। सदैव अपराध बोध से ग्रसित रहेंगे। समाज के एक वर्ग में उठ-बैठ में हिचकिचायेंगे। उन्‍हें अपने जीवन रथ के पहियों में अधुनातन तेल पिलाना होगा। ऐसा करने वे कोई गौरवान्वित कार्य नहीं करेंगे, बस अपने समाज को एक नई दिशा देंगे, जो भविष्‍य के लिए सुखद संदेश देगी। एक लक्ष्‍मण रेखा स्‍थापित होगी। समाजों के बीच नया सौहार्दपूर्ण वातावरण बनेगा। नये वंशवृक्ष की उत्‍पत्ति होगी। वह फलेगा फूलेगा। अनेकों विद्वान स्‍थापित होंगे। सोच के लिए एक दिशा मिलेगी। एक ध्‍येय होगा। जो विद्वान हैं, उन्‍हें पुरोधा बनने के अवसर मिलेंगे। नई शाखा, नये प्रवर, नये गोत्र का परिष्‍करण हो कर नया नामकरण होगा, नई परिपाटी बनेगी। नये परिधान होंगे। नये संस्‍कार बनेंगे। नये विधि-विधान होंगे। अपने ही समाज से निकली एक शाखा के रूप में दूसरे समाज उनसे जुड़ना चाहेंगे, तो गर्व से जुड़ेंगे। परस्‍पर सद्भाव का वातावरण विकसित होगा। तब यह गलत नहीं होगा। पुरातन काल से होता आ रहा है। इतर समाज के लोग जुड़े (रामानुज, गौरांग सम्‍प्रदाय) हैं। इसलिए वर्तमान में तेजी से बढ़ रहे ‘इतर समाज’ को भी विचार करना होगा अपने भविष्‍य के बारे में।
      आज जो हो रहा है, वह गलत हो रहा है। आज दोनों समाज के बीच कोई टीस, कोई कसक पनप रही है। एक खाई बढ़ती जा रही है, जो विकराल रूप न ले ले। अनुचित तरीके से छिपते-छिपाते रिश्‍ते हो रहे हैं। वैदिक संस्‍कारों का मखौल उड़ाया जा रहा है। विवाह सम्‍बंध विच्‍छेद हो रहे है।। अन्‍य ‘इतर समाजों’ की लौकिक परम्‍परायें आत्‍मसात् कर रहे हैं। खान-पान बदल रहा है। सब मौन हैं, तमाशा देख रहे हैं। ऐसा नहीं कि मूल समाज में क्रांतिकारी वर्ग नहीं है। यथार्थ तो यह है कि पुरातन समाज में ही क्रांतिकारी पक्ष सबल और समर्थ है। आक्रोश दोनों पक्षों में प्रबलता पर है। पर शेष की दशा-------सत्‍य तो यह है, देखी नहीं जा रही। आज भले ही गोकुलस्‍थ-मथुरास्‍थ में अनुशासन की सीमा खत्‍म हो गई है, किन्‍तु ठेठ परम्‍पराओं से जुड़े सभी पुरातन परिवार आज छिन्‍न-भिन्‍न या प्रदूषित हैं। वे सामाजिक पोषण के अभाव में टूट रहे हैं या समस्‍याग्रस्‍त हैं। उन्‍हें सम्‍हालने के लिए समाज के पास कोई नीति, कोई सम्‍पदा या कोई कोष नहीं है। ऐसे में अपने ही ‘इतर समाज’ से संक्रमित वे जीवन के उस दो राह पर खड़े हैं, जहाँ उत्‍थान की सम्‍भावनायें कम, पतन की अधिक हैं। ऐसे में वर्तमान ‘इतर समाज’ का दायित्‍व है कि एक स्‍वस्‍थ परम्‍परा, स्‍वस्‍थ परिपाटी का श्रीगणेश करें और एक नई लहर लायें।
      आज ‘इतर समाज’ मौन धीरे-धीरे पुरातन समाज पर जिस गति से छाता जा रहा है, यह गम्‍भीर विषय है। यह मौन आने वाले तूफान का संकेत है। यह संक्रमण रुकना चाहिए। दोनों समाजों के बाहुबलियों को स्‍वस्‍थ विचारविमर्श कर इस पर एक राय, एक मत, एक मार्ग निकालने के लिए सौहार्दपूर्ण वातावरण विकसित करने के लिए साझा प्रयास करने होंगे और ‘तैलंगकुलम्’ जैसे माध्‍यम को इसमें पहल करनी होगी। किमधिकम्।

बुधवार, 16 जुलाई 2014

तैलंगकुलम् का प्रतिभा सम्‍मान समारोह 20 जुलाई को जयपुर में

वैल्‍लनाडु  ब्राह्मण समाज का एक मात्र सशक्‍त संवादवाहक त्रैमासिक पत्र 'तैलंगकुलम्' हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी बृहद् स्‍तर पर समाज के सभी वर्ग के प्रतिभावान्, योग्‍य, विद्वज्‍जनों, छात्र-छात्राओं, युवाओं, शोधार्थियों, अन्‍यत्र सम्‍मानित साहित्‍यकारों, कलाकारों और सम्‍पूर्ण जीवन समाज व देश के लिए साहित्‍य कला और संस्‍कृति से जुड़े हुए लोगों को लाइफ टाइम एचीवमेंट सम्‍मान से भी सम्‍मानित करेगा। तैलंगकुलम् का इस आयोजन का 20 जुलार्इ 2014 को सायं 4 बजे शुभारंभ होगा, जयपुर के सूचना केंद्र के सभागार मेंं। इस कार्यक्रम में जिन प्रतिभाशालियों को सम्‍मानित किया जायेगा, उनके बारे में जानने के लिए आप फेसबुक पर तैलंगकुलम की टाइमलाइन पर विस्‍तार से पढ़ सकते हैं। फि‍र भी इसे यहाँ क्लिक कर के इसे विस्‍तार से पढ़ा जा सकता है।
तैलंगकुलम् एक पत्र ही नहीं एक ऐसा माध्‍यम है जिसके द्वारा यह समाज शहर या प्रदेश में ही नहीं सम्‍पूर्ण भारत में अपनी एक 


पैठ बनाता जा रहा है। आरंभ में 'वंशवृक्ष', 'समवेत', 'सान्निध्‍य-स्रोत' और अब 'तैलंगकुलम्'। यह पत्रकारिता के माध्‍यम से इतना चर्चित नहीं है, चर्चित है उसके आयोजनों से। हर वर्ष प्रतिभाओं का सम्‍मान, त्रैमासिक इस पत्र से समाज की गतिविधियों को गंभीरता से सम्मिलित करते हुए उसे गति देना, लुप्‍तप्राय होती जा रही संस्‍कारों की आधारशिला को एक नई ऊर्जा देने के लिए दो वर्ष में एक बार आयोजित  सामूहिक यज्ञोपवीत  संस्‍कार समारोह। यह हमारे समाज में एक नई ऊर्जा का एक नई क्रांति का सूत्रपात हुआ है। इन आयोजनों से और आयोजन में सम्मिलित हो रहे हमारे परिवारों में यह नई चेतना *तैलंगकुलम्* को एक धरोहर के रूप में स्‍थापित करेगी। वर्ष 2012 में आचार्य पं0 डा0 अच्‍युत लाल भट्ट के सान्निध्‍य में पहला सामूहिक यज्ञोपवित संस्‍कार समारोह आयोजित हुआ था। सामूहिक यज्ञोपवित समारोह जयपुर में सम्‍पन्‍न हुआ था। इसकी झलक आप वीडियों पर देख सकते हैं। टाइमलाइन पर विज्ञप्ति के माध्‍यम से तैलंगकुलम् परिवार ने समाज के सभी परिवारों को सादर आमंत्रित किया है।